Sunday, March 4, 2012

वो मेरे नखरे उठा रहा था.......

वो मेरे नखरे उठा रहा था.
यूँ इश्क़ या रब जता रहा था.

है खुद को खोना भी खुद को पाना,
वो मुझको मुझ से चुरा रहा था.

कि हो सके राह-ए-रूह रौशन,
वो ज़िस्म अपना जला रहा था.

वो एक पौधा या यूँ भी कह लें,
उम्मीद आँगन लगा रहा था.

वो घांस सा झुक गया तभी तो,
तूफानों में भी बचा रहा था.

मैं ख्व़ाब सा पल रहा था लेकिन,
वो नींद अपनी बहा रहा था.

थे चंद लम्हों के दिल के रिश्ते,
वो उम्र भर जो निभा रहा था.

छिपा रहा था मैं हर्फ़ जिनसे,
वो उनके किस्से बता रहा था.

वो कल मुहब्बत की रौ में बहकर,
दीवारें घर की ढहा रहा था.

वो मेरी ग़ुरबत पे हँस गया था,
मैं किश्त जिसके चूका रहा था.

* राकेश जाज्वल्य. 11.02.12
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Monday, January 30, 2012

फिर नैनों ने चाल चली है.... (गीत)

फिर नैनों ने चाल चली है,
हो सके तो बचना.
तू ना फंसना चालों में
दिल तू ना फंसना...
तू ना फंसना धोखे में
दिल तू ना फंसना....

१.
हल्की- हल्की बूंदा-बांदी,
भीगा-भीगा मौसम.
गाल के गुलाबों पे
उगते- ढलते शबनम.
कारी- कजरारी बतियों से..
चाहे तुझको डसना....तू ना फंसना...
२.
फेंकें ये निगाहें,
कभी हँस के बुलाएँ.
गोल- मोल बोलें,
कभी आँखें दिखाएँ.
इनके सारे नखरे झूठे..
कोई कहानी सच-ना....तू ना फंसना...
३.
कितने प्यारे-प्यारे लगें,
नैनों के तमाशे.
चाशनी में शक्कर की,
नीम के बताशे.
इनके तिरछे बोल नशीले..
सोच-समझकर चखना....तू ना फंसना...

फिर नैनों ने चाल चली है,
हो सके तो बचना.
तू ना फंसना चालों में
दिल तू ना फंसना.

: राकेश जाज्वल्य. २२.०१.२०१२.

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Saturday, January 21, 2012

नम निगाहें लिए...... मुस्कुराती रही...

नम निगाहें लिए...... मुस्कुराती रही.
इक सदा अनसुनी.... याद आती रही.

अब कहाँ जाऊं मैं ....अपनी खताएँ लिए,
पहले सब गलतियाँ... माँ छिपाती रही.

बिगड़े मौसम में भी... लहरों पर बढ़ चली,
कश्ती तूफ़ान को..... आजमाती रही.

हमसफ़र बन के वो... साथ जब भी चले,
राह खुद मंजिलों....को दिखाती रही.

बात बढ़ भी गयी..... बात ही बात में,
बात ही बात में...... बात जाती रही.

ख्वाह म'ख्वाह पड़ गया.... इश्क़ मेरे गले,
ख्वाहिशे- ख़ुदकुशी.. थी जो जाती रही.

* राकेश जाज्वल्य.
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Saturday, December 24, 2011

कुछ भी नहीं......

बस इक कली है प्याज की,
ये प्यार.... और ये ज़िन्दगी..
 

परत-दर- परत.... और कुछ भी नहीं.

* राकेश. २४.१२.२०११.
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Saturday, November 12, 2011

तुझ को पाने का ज़रिया है.

तुझ को पाने का ज़रिया है.
खुद को भी यूँ याद किया है.

कल दरिया में चाँद था लेकिन,
आज चाँद में इक दरिया है.

साँझ अगरबत्ती-सी महकी,
रात भी जलता एक दिया है.

पँख फैलाये..... नन्हे पंछी,
सोच रहे हैं... अंबर क्या है.

तुमसे मिलकर दिल ने सोचा,
अच्छी है..... जैसी दुनिया है.

देर से लौटूं..... कान उमेठे.
दादी- सी.... मेरी बिटिया है.

याद की चादर ओढ़ के जगना, 
तुझ बिन सोने से बढ़िया है. 

: राकेश जाज्वल्य. 11.11.11.
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Sunday, November 6, 2011

दो पंक्तियाँ...

जान ले लेती बेरुखी तुम्हारी.. चैन तो मिलता,
मुस्कुरा के जो देखा तुमने.. अधमरा कर दिया.


******* राकेश. १९.१०.२०११ *********

Saturday, October 15, 2011

माँ...

तेज धूप में
एक टुकड़ा बादल,
मेरे साथ-साथ
चलता रहा.

माँ आसमाँ से भी
मुझ पर,
दुआओं का आँचल
डाले रही.


:राकेश. ०९.०५.११
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