नन्ही राशि की नई रचना प्रस्तुत है, राशि ने कई दिनों पहले इसे लिखा था, आज उसने याद दिलाया की अभी तक मैंने इसे पोस्ट नहीं किया है। तो लीजिये आज मौका मिल ही गया. ------------------
जब फूल खिलते... ------------------ जब फूल खिलते हमको अच्छे लगते। तितलियाँ आतीं फूल पर बैठती, छोटी- छोटी कलियाँ सुंदर फूल बनतीं। जब चिड़ियाँ आतीं, हम उसे चाँवल के दाने देते।जब छोटे फूल खिलते,हम उन्हें तोड़ते नहीं। जब फूल खिलते हम को अच्छे लगते. -------------------: निर्झरा राशि.
-------------------------------------तेरे ख्यालों में आया जो, मैं नहीं शायद।रहा भटकता मगर मैं भी वहीँ-कहीं शायद.
रहा है शौक, तेरी ही गली का बचपन से,अपने कदमो से मगर मैंने कहा नहीं शायद.
किसी का ख्वाब था या फिर कोई सितारा था,ऐसा टूटा कि फिर मिला वो कहीं नहीं शायद.
यही मंजूरे -खुदा था तो क्यूँ मिले थे हम,सारी मर्ज़ी मेरे खुदा की, सही नहीं शायद।कई सदियों से जो पत्ता रुका था डाली पर, तेरे हाथों मिलेगी उसको अब जमीं शायद। ---------------------------------------: राकेश जाज्वल्य.
राहों में उड़ते
पीले-भूरे पत्ते,
तेज हवाएँ,
धुल भरी आंधियां,
चुभती धूप,
दिनों-दिन
बढती गर्मी,
सुने रास्ते,
लम्बे दिन,
उमस दोपहरी,
अनबुझी प्यास,
ठंडी छाँव,
मीठा पानी,
अलसाया अलसाया मन....
सावन और शिशिर की तरह
अब इस पतझड़ में भी,
तेरी याद ने,
कितने रूप धरे है ...जानाँ.
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rahon me udte
pile-bhure patte,
tej hawayen,
dhul bhari aandhiyan,
chubhti dhoop,
dino.n-din
badhti garmi,
sune raste,
lambe din,
umas dopahri,
anbujh pyaas,
thandhi chhao.n,
meetha pani,
alsaaya alsaaya man...
sawan aur shishir ki tarah
ab is patjhad me bhi,
teri yaad ne,
kitne rup dhare hai.n...jaana.n.
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: राकेश जाज्वल्य.
आज सुबह-सुबह देखा घर की दीवारों पर खिल आये है फूल, कहीं लाल, कहीं पीले, कहीं नीले- नीले, ओह .... याद आया... तुम्हें लिखे ख़त पर कल छलक गयी थीं पानी की कुछ बूंदें, उभर आये थे शब्द, हलके गीले होकर , सहज ही लहरा कर सुखा दिया था ख़त मैंने हवा में, और छिटंक गयी थी घर की दीवारों पर स्याही तेरे ख़त की। ============ : राकेश
कुछ यूँ नज़र आती हैं
बारिश के
पानी की बूंदें,
ठंड के दिनों में,
कि जैसे....
सर्द सफ़ेद घने कोहरों की
चादर बुनने की
मेहनत में,
उभर आया हो
पसीना,
मौसम के
मासूम चेहरे पर.
हलकी सी बारिश
ठंड में,
मौसम की
हलकी ठिठुरन
कुछ और बढा देती है.
सहज ही...
हो जाता है मन,
तेरी बांहों के
कम्बल में आने को.
बदल जाता है
अक्सर,
मेरे दिल और ..
कमरे का
मौसम भी,
कुछ इसी तरह.
ठंड के दिनों में,
सुबह-सुबह
तुम अपनी
गीली जुल्फें,
जोर से
झटका ना करो,
जानां !.
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: राकेश जाज्वल्य.
आओ हम तुम भी चलें, बन के नयी राह कोई।
क्यूँ ना रक्खें, इस ज़माने से जुदा चाह कोई।
हाँ ये सच है के, होता है हर एक शय का नसीब,
किसने रोका है मगर, थाम लो तुम बांह कोई।
वो जो अपना है, मुकर जाता है इक पल में कभी,
कुछ ना होगा, जो तुम भरते ही रहो आह कोई।
रुको ना तुम, नहीं रुकता कोई किसी के लिए,
उड़ो के अब हमें मंजिल की ना परवाह कोई।
तेरी जमीं में सितारों की तरह ख्वाब उगें,
तेरा वजूद मुकम्मल हो बने छांह कोई ।
यूँ ना संभाले रखो, दिन ये उदासी वाले,
रुत बदलती है के बैठा है कही शाह कोई।
तेरी नज़र का हर एक गीत इतर सा महके,
तुझे दुनिया की निगाहों से मिले वाह कोई।
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: राकेश.
प्यार-मुहब्बत, रिश्ते-नाते,
सपनों-साँसों से जूझ रहा.
लाख पहेली बुझी लेकिन,
मन फिर भी अबूझ रहा.
उम्मीदों के गहरे सागर,
आकांक्षा के नव जलसा-घर,
सोचा करता है यह प्रतिपल,
कुछ घट जाता बाहर-भीतर.
लक्ष्य हजारों, रस्ते लाखों,
राह नयी पर पूछ रहा.
लाख पहेली बुझी लेकिन,
मन फिर भी अबूझ रहा. I1I
चाँद सितारों पर बसता है,
फाका मस्ती में हँसता है,
जब भी इससे बचना चाहें,
हंसकर बाँहों में कसता है.
कभी यह बाबा आदम जैसा,
कभी नया कुछ सूझ रहा.
लाख पहेली बुझी लेकिन,
मन फिर भी अबूझ रहा. I2I
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: राकेश जाज्वल्य.