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Monday, April 16, 2012

झूठ है...... कि तुझ से कोई वास्ता नहीं,
इन दिनों मुझको मगर, खुद का पता नहीं.


तुम मिल जाओ अगर मुझको... तो  खुद  का  पता मिले.

: राकेश जाज्वल्य. 16.04.2012

Friday, April 22, 2011

जलन ...

कह रही थी रात सुबह से जो सुबह-सुबह,
तुम्हारी ही खुश्बुओं की कुछ बात थी शायद.

....पूरा दिन हर-श्रृंगार लाल-पीला होता रहा.


: राकेश.
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Thursday, March 10, 2011

फूंक.........(त्रिवेणी)

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हौले से नमी वाली इक फूंक मारें.
चाँद की आखों से चलो धूल झारें.

अब चेहरा तुम्हारा कुछ साफ़ नज़र आता है.

: राकेश जाज्वल्य. 10.03.2011
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Friday, February 25, 2011

सफ़र....

 
मैंने माना मेरी जानां, कि चलते रहना है बहुत मुश्किल,
पर जो मंज़िल पर हो तुम, तो कदम सुनते नहीं मेरी.

सात जनमों की ही तो बात है, इक सफ़र मैं भी पूरा कर लूँ.

: राकेश जाज्वल्य
२५.०२.२०११.
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Monday, July 12, 2010

चाँद की झूठी कसमे........(त्रिवेणी.)

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उनके रूठे-रूठे दिल को यूँ अक्सर बहलायें हम।
सच्चे इश्क की ख़ातिर चाँद की झूठी कसमें खाएं हम।

खुदा मुआफ़ करे ..... चाँद के चेहरे  के लिए।

* राकेश जाज्वल्य।
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Monday, June 14, 2010

हलचल..............

फिर आज कुछ हलचल सी है, इन आँखों की झील में,
फिर पैर डुबोये ख़्वाबों ने, पलकों पे बैठकर।

ये ख्वाब हैं या आंसुओं के छलकने का सबब कोई।

* राकेश जाज्वल्य
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Friday, June 4, 2010

मोहलत .....


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नींद भी, ख्वाब भी, है रात भी उसी की ,
चाहेगा जब भी वो, ये आँखें मूंद लूँगा मै.

काँधों पे अपने बस मुझे इक नींद की मोहलत देना...
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: राकेश

Saturday, May 22, 2010

नमी......

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गिराये हैं ख्वाब गीले... पीले पत्तों की आड़ में,
आज फिर   दरख्तों तले  मिटटी में नमी है।


सदियाँ  हुईं  ...सुना है.....यहाँ  सुखा नहीं पड़ा।
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: राकेश जाज्वल्य.

Monday, April 19, 2010

दो त्रिवेणियाँ.....


दो त्रिवेणियाँ - तीन पंक्तियों की छोटी सी रचना- प्रस्तुत है,
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१ बरसात .....
यूँ तुम्हारी मुहब्बत को तरसा हूँ अभी.
बनकर ओस निगाहों से बरसा हूँ अभी.

चेहरा तुम्हारा भी कुछ भीगा-भीगा लगता है.

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2. घाल -मेल......

खुद को दी आवाज़, कभी जब मैंने तुम्हे पुकारा,
तेरा चेहरा आया नज़र, जब मैंने खुद को निहारा.

मुहब्बत का खेल है....बड़ा निराला घाल-मेल है....

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: राकेश जाज्वल्य.