Showing posts with label kavita. Show all posts
Showing posts with label kavita. Show all posts

Saturday, March 29, 2014

समय (दो कविताएं )

धागा 
समय के साथ 
कमज़ोर ही होता है 
यद्यपि, 
फिर भी... 

यक़ीन है 
कि... 
थामे रखेगा 
इसके दोनों सिरे 
अपने दोनों हाथों से 
समय ही. (1)
-----------------------------------

लौटेगा नहीं 
मगर..
गुजरेगा
फिर -फिर कर 
हर ईक बिन्दु से 

समय, 
कि.. 
अपनी ही 
परिधी के बाहर 
नही है गति 
समय की भी. (2)

-----------------------------------
© राकेश जाज्वल्य.

31.01.2014

Wednesday, January 15, 2014

रूपांतरण ...


"विचार वस्तु बन जाते हैं "
.
.
देखना....  ईक दिन...
मैं.... तुम हो जाऊंगाँ. 

© राकेश जाज्वल्य. 
11.01.2014

Thursday, April 25, 2013

तेरी ओर.......


तेरी ओर   ...... 
मेरे ख्याल  के   
पहला कदम उठाने  
और ......रखने के बीच का   
थोडा सा वक्त .. 
और ... 
थोड़ी सी ....दूरी...ही..  
मुहब्बत  है  ...शायद !  
और हाँ ... 
ज़िन्दगी भी !!! 

:
राकेश जाज्वल्य. 

20.04.2013 

Thursday, March 28, 2013

कुछ मीठा-मीठा सा ....

जब भी फेरता हूँ 
जीभ... होंठो पर, 
मिल ही जाता है.. 
अपनी मिठास लिए कोई लम्हा...अक्सर.

कभी... छुपाकर तुमसे 
मन की जेबों में 
भर ली थी.... 
तुम्हारी किसमिस जैसी बातें. 

ज़िन्दगी.... उस दिन से ही 
कुछ मीठी- मीठी है. 

: राकेश जाज्वल्य. 
RAKESH JAJVALYA 20.03.2013

Friday, February 22, 2013

यकीन.....

  
प्रेम,
प्यार,
प्रीति, 
मुहब्बत, 
प्रणय, 
चाह ......
किसी भी नाम से 
पुकारूँ तुम्हें,
या..फिर 
खामोश रहूँ...
बरसों- बरस. 

मुझे यकीन  है.. 
ज़िन्दगी.. !!!

तुम्हारे लिए भी,
मायने रखता है..
अहसास .....
साथ होने का,
... पुकारा जाना नहीं.

* राकेश जाज्वल्य
rakesh jajvalya 09.02.13
 

Thursday, December 6, 2012

इक ख़ूबसूरत याद का........ यूँ बीच राह में मिलना,
बारिश की इक शाम जैसे..... सूरजमुखी का खिलना. 

वो कालेज वाली चौक पर.. इक दुकान थी गपशप की,
गुजरना तेरी गलियों से.. बस बतियाते बे-मतलब की.


औधें पड़े - पड़े बिस्तर पर.. अक्सर ताका करते छत,
अधखुली पलकों पर सुनते..... तेरे सपनो की आहट.

उगती सुबहें, ढलती शामें ...... लता-किशोर के गाने,
..............................
....... तेरी याद के सौ बहानें.
 
: राकेश जाज्वल्य.

Friday, November 9, 2012

.............भला  कब
अकेला होता हूँ मैं,

कागज़, पत्ते, फूल, धूल,
खुशबु, धूप, बारिश, साँसें
सब तुम्हारी याद की
वज़हें बन जाती हैं

* राकेश जाज्वल्य. 07.11.12

Saturday, April 21, 2012

और.. क्योकि हम किसी भी तरफ नहीं.........


यह सुबहो-शाम की नाज़ुक मिज़ाजी के दौर से बाहर आने का वक्त है.
गर्म हवाओं ने पेशानी पर लिखी तक़दीर के सफ्हे झुलसा दिए हैं,
मेरी जाँ! .. यह भरी दोपहरी अब आदमी से आदम में बदल जाने का वक्त है.

हुकुम है आकाओं का..बंदूकों और सिक्कों से नयी दुनिया बनाई जाये.

हुकुम रहनुमाओं का भी है...वोटों और नोटों से हर राह सजाई जाये.

जंगलो में मिटटी के नीचे रोटियां दबायीं है किसी ने,
यहाँ के पेड़ों पर ख्वाबों के चीथड़े लटकते है.

कि...नशा अब यहाँ सल्फी में नहीं...लहू में है.

यहाँ की हवाओं ने भी अब अपने रंग बदल लिए हैं.....
मेरी जान!.. यह सुनहरी शाम नहीं...के सूरज डूब रहा हो क्षितिज पर,
यह सांसों के रुकने से हरीतिमा के चेहरे पर उभर आई लालिमा है.

बावजूद ... .. अजगरो के जबड़ों में फंसे हम... अक्सर हिरणों की हँसी हँसते हैं,
कल रात हम... अपने ही आँगन में......
महुआ की उदास गंधों के साथ,
...कटे, पके..... और .... खा लिए गए.

अब यहाँ चैन से जीना मुश्किल है....और...चैन से मरना दूभर.


सूखे-भूरे पत्तों पर बूटों की धीमी आवाजों और कोयल की तेज़ कूकों के बीच..जैसे सारे अंतर मिट गए हों... जागने और सोने के, हँसने और रोने के, काटने और बोने के.

और.. क्योकि हम किसी भी तरफ नहीं... इसलिए... मारे जायेंगे... दोनों ही तरफ से.

: राकेश  जाज्वल्य. २५.०३.२०११.
---------------------------------------------------------

Saturday, October 15, 2011

माँ...

तेज धूप में
एक टुकड़ा बादल,
मेरे साथ-साथ
चलता रहा.

माँ आसमाँ से भी
मुझ पर,
दुआओं का आँचल
डाले रही.


:राकेश. ०९.०५.११
-------------

Friday, April 8, 2011

ये साली ज़िन्दगी....

जितनी दिखती है,
उतनी खुबसूरत नहीं है.
भावनाओं में बहने की
ज़रूरत नहीं है.

ज़िन्दगी है ही ऐसी.
इसकी ऐसी की तैसी.


दिल की भी कभी सुन ले,
ऐसी सोच नहीं है.
बड़ी कड़क है साली,
ज़रा भी लोच नहीं है.

हरदम रहती ऐठीं,
इसकी ऐसी की तैसी.



बड़ी ही ना-शुक्री है,
पास नहीं आती,
सुविधाओं के कीचड़ में,
पड़ी रहे अलसाती.

मोटी-काली-भैसीं.
इसकी ऐसी की तैसी.


इसकी मीठी, रसभरी,
बातों पर हँसना नहीं.
करना हाथों पर यकीं,
लकीरों में फंसना नहीं.

झूठी प्रेमिका जैसी.
इसकी ऐसी की तैसी.


: राकेश ०९.०४.२०११.
--------------------

Monday, September 20, 2010

बदतमीज़ रात!....

कल की रात ! ...
बड़ी बदतमीज़ .

रात भर
साथ रही ही रही,

पूरा दिन भी
जगाती ही रही.

तुम्हारे जाने के बाद,
याद तुम्हारी....

जाती भी रही....
..आती भी रही.

: राकेश जाज्वल्य. २०.०९.१०
***************

Monday, June 7, 2010

पुकार.....

चलो उन पर्वतों के ऊपर...
सबसे ऊपर जहाँ सिर्फ आसमान है,
और या फिर खुदा है,
आसमानों के भी ऊपर.
अब पुकारों उन्हें,
उम्मीद है....
यहीं हो पायेगी उनसे बातें,
मांगों जो भी चाहते हो,
मांगों जिसे भी चाहते हो,
मांगों फूल, खुशियाँ, प्यार,
ताजी हवा, समय पर बारिश,
मांगों बच्चों की मुस्काने,
बच्चियों की सुरक्षा भी मांगों.
मांगों.......
सच कहने की हिम्मत.
ताकत मांगों.......
जांत-पांत, भेद- भाव दूर करने के लिये.
आने वाले बच्चों के लिये
सुनहरा कल मांगों,
थोड़ी दुआएं भी मांग लो..
आज के बुजुर्गों के लिए.
कुछ मत छोडो......
सब मांग लो...
और लौटो....खाली हाँथ.
कमबख्तों...
वो सारी चीजें
जो तुम खुद कर सकते हो यहाँ..
इसी जमीं पर.
उसके लिये तो...खुदा भी नहीं सुनेगा तुम्हारी.

* राकेश जाज्वल्य
===================