Monday, June 11, 2012



जो तेरी "जली-कटी" ख़त्म हो गयी हो, ऐ ज़िन्दगी !,
तो थोड़ी देर मैं भी अपना "कलेजा" जला लूँ.

jo teri " jali-kati" khatm ho gayi ho, Ae zindagi !,
to thodi der main bhi apna "kaleja" jala lun.

: राकेश जाज्वल्य. 12.06.12

Thursday, June 7, 2012



रहे ज़हन में अगर, वक्त पर काम आती है,
नाराज़गी माँ की महज़ नाराज़गी नहीं होती.

rahe zahan me agar, vakt par kaam aati hai,
narazgi maa ki mahaz narazgi nahin hoti.

: राकेश 07.06.2012

Wednesday, June 6, 2012

main muhabbat sajane chala tha,
Zindagi be-tarteeb ho gai. 


मैं मुहब्बत सजाने चला था,
ज़िन्दगी बे-तरतीब हो गई.


: राकेश 31.05.2012

Friday, May 25, 2012

सीधी-सीधी बात है....


मीठी धूप हथेलियों में...... अब के भर ली जाये.
सीधी-सीधी बात है....... मुहब्बत कर ली जाये.


पूरा दिन बेचेनी वाले...... लम्हे थामे रहता हूँ, 
खुरची -खुरची नींदों वाली रात भी धर ली जाये .


मुझको भी मालूम है कि तुम दाल जलाया करती हो,
क्यूँ न यह इल्ज़ाम आज से अपने सर ली जाये. 


आसमां में छेद करें या... उड़ें जमीन के भीतर,
ख्वाब कभी आँखों के भी..हद से बाहर ली जाये. 


सीधी-सीधी बात है ..... 



: राकेश 25.05.12

Wednesday, May 23, 2012

दिल हमारा ......


दिल हमारा सांस गिनते थक गया .
ख़त्म क्यूँ होता नहीं ये सिलसिला.

उफ़ वो ऊँगली, उफ़ वो खंज़र क्या कहें, 
उनके हाथों मरने में क्या लुत्फ़ था.


हमने कल उनके सभी ख़त फाड़ कर, 
अपनी ख़ामोशी से यूँ बदला लिया.  


होते- होते इक हकीकत रह गयी,
बनते- बनते इक फ़साना रह गया. 


यूँ लगा जैसे  बिखरने हम लगे, 
हम से वो इतने तकल्लुफ से मिला.

: राकेश जाज्वल्य. 24.05.12

Thursday, April 26, 2012

जी रहा हूँ मैं, अब भी तुम्हारे बिन,
क्या अब भी सोचती हो-" तुम्हे याद नहीं करता" ?


: राकेश. 26.04.2012

Saturday, April 21, 2012

और.. क्योकि हम किसी भी तरफ नहीं.........


यह सुबहो-शाम की नाज़ुक मिज़ाजी के दौर से बाहर आने का वक्त है.
गर्म हवाओं ने पेशानी पर लिखी तक़दीर के सफ्हे झुलसा दिए हैं,
मेरी जाँ! .. यह भरी दोपहरी अब आदमी से आदम में बदल जाने का वक्त है.

हुकुम है आकाओं का..बंदूकों और सिक्कों से नयी दुनिया बनाई जाये.

हुकुम रहनुमाओं का भी है...वोटों और नोटों से हर राह सजाई जाये.

जंगलो में मिटटी के नीचे रोटियां दबायीं है किसी ने,
यहाँ के पेड़ों पर ख्वाबों के चीथड़े लटकते है.

कि...नशा अब यहाँ सल्फी में नहीं...लहू में है.

यहाँ की हवाओं ने भी अब अपने रंग बदल लिए हैं.....
मेरी जान!.. यह सुनहरी शाम नहीं...के सूरज डूब रहा हो क्षितिज पर,
यह सांसों के रुकने से हरीतिमा के चेहरे पर उभर आई लालिमा है.

बावजूद ... .. अजगरो के जबड़ों में फंसे हम... अक्सर हिरणों की हँसी हँसते हैं,
कल रात हम... अपने ही आँगन में......
महुआ की उदास गंधों के साथ,
...कटे, पके..... और .... खा लिए गए.

अब यहाँ चैन से जीना मुश्किल है....और...चैन से मरना दूभर.


सूखे-भूरे पत्तों पर बूटों की धीमी आवाजों और कोयल की तेज़ कूकों के बीच..जैसे सारे अंतर मिट गए हों... जागने और सोने के, हँसने और रोने के, काटने और बोने के.

और.. क्योकि हम किसी भी तरफ नहीं... इसलिए... मारे जायेंगे... दोनों ही तरफ से.

: राकेश  जाज्वल्य. २५.०३.२०११.
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