यहाँ हैं.. मेरी ग़ज़लें और कवितायेँ...... कितनी भी कोशिश करें, चाहें..पी लें..... सूखती नहीं मगर..खारे पानी की झीलें.
Sunday, March 9, 2014
बचपन, बिल्लस और उम्मीदें..
दुनिया अब पहले जैसी नही रही, न रहे... मगर महाभारत से लेकर आज के भारत तक किसी भी दौर में बचपन को यह दुनिया न तो कभी व्यर्थ लगी है और न ही कभी लगेगी. दुनिया बदली तो शहर, गाँव, मुहल्ले, घर और रिश्ते भी सिमट गए ... वो आँगन भी सिमट गया जहाँ खेलों के साथ-साथ भावी नागरिकों के मध्य स्वास्थ्य, समझ और सद्भाव भी सहज ही विकास पाता था. घरों में एक आंगन की कमी गहरे अर्थों में जीवन में उतर आई कई कमियों की ओर संकेत करती है. मगर मौसमों की तमाम प्रतिकूलताओं के बीच भी बचपन के फूल हमेशा अपने खिलने की जगहें तलाश ही लेते हैं. आँगन नहीं तो क्या हुआ.. छतें ही सहीं.
स्कूलों में, कमरों के भीतर कम्पयूटर पर विडियो गेम्स अपनी जगह, लेकिन.. खुली छत पर "बिल्लस" का मज़ा लेते बच्चे उम्मीदों के नए सूरज उगा देते हैं.
: राकेश जाज्वल्य. 94255 73812
02.03.2014
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Wednesday, January 15, 2014
Thursday, May 2, 2013
लम्हें कुछ.....ek nayi ghazal.
लम्हें कुछ
गुज़र कर भी
गुज़रते नहीं कभी.
कुछ गहरी चोटों
के निशां उभरते
नहीं कभी.
कंकड़ कोई, तिनका
कोई या याद
किसी की,
मोती यूँ ही
निगाह से...... झरते
नहीं कभी.
दरिया- ऐ- इश्क
की भी रवानी
है अनोख़ी
जो डूबते नहीं वो.........
उबरते नहीं कभी.
"लहना"
हो या हो "देव" वो बचपन
की कहानी,
किरदार अपने बीच
के..... मरते नहीं
कभी.
पहुंचे जो गाल तक भी
न आँखों की कोर
से,
वो ख़्वाब उँगलियों से ..... संवरते नहीं कभी.
: © राकेश जाज्वल्य
( सन्दर्भ
: १. लहना सिंह
- "उसने कहा था.",
चंद्रधर शर्मा गुलेरी
२. देव- "देवदास"
शरत चन्द्र चटोपाध्याय
)
Thursday, April 25, 2013
तेरी ओर.......
तेरी ओर ......
मेरे ख्याल के
पहला कदम उठाने
और ......रखने के बीच का
थोडा सा वक्त ..
और ...
थोड़ी सी ....दूरी...ही..
मुहब्बत है ...शायद !
और हाँ ...
ज़िन्दगी भी !!!
: राकेश जाज्वल्य.
20.04.2013
Thursday, March 28, 2013
कुछ मीठा-मीठा सा ....
जब भी फेरता हूँ
जीभ... होंठो पर,
मिल ही जाता है..
अपनी मिठास लिए कोई लम्हा...अक्सर.
कभी... छुपाकर तुमसे
मन की जेबों में
भर ली थी....
तुम्हारी किसमिस जैसी बातें.
ज़िन्दगी.... उस दिन से ही
कुछ मीठी- मीठी है.
: राकेश जाज्वल्य.
RAKESH JAJVALYA 20.03.2013
जीभ... होंठो पर,
मिल ही जाता है..
अपनी मिठास लिए कोई लम्हा...अक्सर.
कभी... छुपाकर तुमसे
मन की जेबों में
भर ली थी....
तुम्हारी किसमिस जैसी बातें.
ज़िन्दगी.... उस दिन से ही
कुछ मीठी- मीठी है.
: राकेश जाज्वल्य.
RAKESH JAJVALYA 20.03.2013
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