Saturday, November 12, 2011

तुझ को पाने का ज़रिया है.

तुझ को पाने का ज़रिया है.
खुद को भी यूँ याद किया है.

था दरिया में चाँद कल तलक  
आज चाँद में इक दरिया है.

साँझ अगरबत्ती-सी महकी,
रात भी ईक जलता दिया है.

पँख फैलाये..... नन्हे पंछी,
सोच रहे हैं... अंबर क्या है.

तुमसे मिलकर दिल ने सोचा,
अच्छी है..... जैसी दुनिया है.

देर से लौटूं..... कान उमेठे.
दादी- सी.... मेरी बिटिया है.

याद की चादर ओढ़ के जगना, 
तुझ बिन सोने से बढ़िया है. 

: राकेश जाज्वल्य. 11.11.11.
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Sunday, November 6, 2011

दो पंक्तियाँ...

जान ले लेती बेरुखी तुम्हारी.. चैन तो मिलता,
मुस्कुरा के जो देखा तुमने.. अधमरा कर दिया.


******* राकेश. १९.१०.२०११ *********

Saturday, October 15, 2011

माँ...

तेज धूप में
एक टुकड़ा बादल,
मेरे साथ-साथ
चलता रहा.

माँ आसमाँ से भी
मुझ पर,
दुआओं का आँचल
डाले रही.


:राकेश. ०९.०५.११
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Tuesday, October 11, 2011

दिन फिर बीता....

दिन फिर बीता.
रीता- रीता.

संग-संग सूखे,
नयन, सरिता.

रात
की  जुल्फें,
चाँद ka फीता.

इश्क़ में एक- 
कुरान ओ गीता.


दिल जब जीते,
तब जग जीता.

मन की करनी,
काम सुभीता. 
 


 राकेश जाज्वल्य. 
०७.१०.२०११ 
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Friday, October 7, 2011

और मेरे करीब आता गया...

और मेरे करीब आता गया.
वो मुझे जितना आज़माता गया.

उसको जीने का हुनर आता था,
वो जो दुनिया से मुस्कुराता गया.

ईद की उसको साल भर खुशियाँ,
जो गले मिल के दिल मिलाता गया.

ये हकीक़त थी, आँख थी मेरी,
ख़्वाब लेकिन वही दिखाता गया.

हाँथ उसके कभी ना खाली रहे,
जो दुआओं से घर सजाता गया.

ये मेरा रब ही जानता है के,
किसकी गलती से अपना नाता गया.

उसका चेहरा चाँद बन बन कर,
ज़हनो दिल मेरा जगमगाता गया.

: राकेश. ३०.०८.११.--------------------------

Thursday, August 25, 2011

खुद से मिलना भी बात भी करना.

खुद से मिलना भी बात भी करना.
तुम भी कोशिश ये जरा सी करना.

वो ना दर से ही लौट जाये कहीं,
घर के कमरों में रौशनी करना.

कैसे कह दूँ वो याद आता नहीं,
मुझसे बातें ना क़ुफ्र की करना.

कुछ तो जादू है उसके खंज़र में,
दिल ने टाला है ख़ुदकुशी करना.

रात आँखों में चाँद का घुलना,
उफ़...ये यादों से दोस्ती करना.

* राकेश जाज्वल्य. ०७.०८.२०११
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Wednesday, July 27, 2011

सरहद-सरहद अनबन क्यूँ हो...

भीगा-भीगा दामन क्यूँ हो.
रूठा-रूठा सा मन क्यूँ हो.

हों कमरे विस्तारित लेकिन,
कटा-कटा सा आँगन क्यूँ हो.

प्यार की ठंडी छांह मिले तो,
रुखा-रुखा बचपन क्यूँ हो.

मीठी-मीठी हो गर बतियाँ,
खट्टा-खट्टा सा मन क्यूँ हो.

खिली-खिली हर सूरत झलके,
टूटा-फूटा दर्पण क्यूँ हो.

महके सोंधी-सोंधी धरती,
सरहद-सरहद अनबन क्यूँ हो.

साफ़-साफ़ हो दिलों के रिश्ते,
दामन-दामन उलझन क्यूँ हो.

: राकेश जाज्वल्य. ०१.०७.२०११.
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