Tuesday, May 10, 2011

मुहब्बत.....

काँच पे साँस के भाप के जैसी.
मुहब्बत मीठी-ताप के जैसी.



फिर से सिरहाने लौट कर आई,
रात के आधे ख़्वाब के जैसी.


सूनी आँखों में गुमशुदा चेहरा,
या कि..चटके गुलाब के जैसी.


खुली पलकों की अधखुली बातें,
गीले अधरों के कांप के जैसी.


मन के गुम-सुम, उदास कोने में,
किसी ईश्वर के जाप के जैसी.


कांच पे साँस के भाप के जैसी.
मुहब्बत मीठी-ताप के जैसी.


: राकेश जाज्वल्य. १०.०५.२०११.
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Friday, April 22, 2011

जलन ...

कह रही थी रात सुबह से जो सुबह-सुबह,
तुम्हारी ही खुश्बुओं की कुछ बात थी शायद.

....पूरा दिन हर-श्रृंगार लाल-पीला होता रहा.


: राकेश.
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Friday, April 8, 2011

ये साली ज़िन्दगी....

जितनी दिखती है,
उतनी खुबसूरत नहीं है.
भावनाओं में बहने की
ज़रूरत नहीं है.

ज़िन्दगी है ही ऐसी.
इसकी ऐसी की तैसी.


दिल की भी कभी सुन ले,
ऐसी सोच नहीं है.
बड़ी कड़क है साली,
ज़रा भी लोच नहीं है.

हरदम रहती ऐठीं,
इसकी ऐसी की तैसी.



बड़ी ही ना-शुक्री है,
पास नहीं आती,
सुविधाओं के कीचड़ में,
पड़ी रहे अलसाती.

मोटी-काली-भैसीं.
इसकी ऐसी की तैसी.


इसकी मीठी, रसभरी,
बातों पर हँसना नहीं.
करना हाथों पर यकीं,
लकीरों में फंसना नहीं.

झूठी प्रेमिका जैसी.
इसकी ऐसी की तैसी.


: राकेश ०९.०४.२०११.
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Monday, April 4, 2011

खूबसूरत चिठिया...

राशि और आशि
दोनों नन्ही परियों के लिए...

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प्यार में लिखी,
खूबसूरत चिठिया है.
आँगन में दौड़ती-खेलती,
नन्ही-सी बिटिया है.


कभी वो मेरी दादी अम्माँ,
कभी वो मेरी नानी है.
उसकी सपनीली आँखों में,
मेरी ही कहानी है.


अक्सर मेरी डांटें
भूल जाती है.
हँस कर बांहों में
झूल जाती है.


स्कुल, घर,
जहाँ की बातें हैं.
उसकी नींदें हैं,
मेरे काँधें हैं.


उसका चेहरा
मेरे हर्ष में.
वो मेरे दिन,
महीने वर्ष में.


इतने निश्छल,
प्यारे प्यार के लिए.
ईश्वर तेरा शुक्रिया,
इस उपहार के लिए.

: राकेश. ०४.०४.२०११.
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Sunday, March 13, 2011

दिल का ये अफ़साना......

दिल का ये अफ़साना जी.
सबको नहीं सुनाना जी.


तन्हाई में गूंजा करता
है, यादों का गाना जी.


कच्चा आँगन, पक्का पीपल,
कहाँ वो दादा-नाना जी.


बचपन में चोटी खिंची थी,
दिल उसका हर्ज़ाना जी.


सुबह-सुबह गर शाम मिले
तो, आशीषें ले जाना जी.


अच्छा है जो अखियाँ भीगीं,
नमी में उगता दाना जी.


आँसू बहते दुःख में, सुख में,
अच्छा ताना- बाना जी.


: राकेश जाज्वल्य. १२.०३.२०११.
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Thursday, March 10, 2011

फूंक.........(त्रिवेणी)

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हौले से नमी वाली इक फूंक मारें.
चाँद की आखों से चलो धूल झारें.

अब चेहरा तुम्हारा कुछ साफ़ नज़र आता है.

: राकेश जाज्वल्य. 10.03.2011
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