Sunday, October 10, 2010

ना जाने किस ओर....

ना जाने किस ओर...मेरी जान चला हूँ मैं।
जब से बिछड़ा हूँ तुमसे बस जला हूँ मैं।

तुम भी आओ...मेरी ज़ानिब धूप बनकर कभी,
कब से पत्तों पर शबनम -सा ढला हूँ मैं।

सब के हाथों...में पत्थर मेरी फ़िराक में,
जिस्म ले कर शीशे का पर चला हूँ मैं।

मैं कभी तो निगाहों से रात बनकर बहा,
और दिन सा निगाहों में भी घुला हूँ मैं।

हर कहानी...में तुम्हारी दास्ताँ की तरह,
तुमको गज़लों में कहने की कला हूँ मैं।

बे-मुरव्वत...तंगदिल, मतलबी शहर में,
तेरी आँखों में सपनों सा पला हूँ मैं।

तुमसे शिकवा...तुमसे चाहत, तुमसे ही दिल्लगी,
तुम ही जानों के बुरा हूँ या भला हूँ मैं।

: राकेश जाज्वल्य. ०९ .१०.१०
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2 comments:

वन्दना said...

बहुत सुन्दर अभिव्यक्ति।

ana said...

तुमसे शिकवा...तुमसे chahat, तुमसे ही दिल्लगी,
तुम ही जानों के बुरा हूँ या भला हूँ मैं।
ये पन्क्तियां दिल को छू गयी …………॥अभूतपूर्व प्रस्तुति