Friday, April 8, 2011

ये साली ज़िन्दगी....

जितनी दिखती है,
उतनी खुबसूरत नहीं है.
भावनाओं में बहने की
ज़रूरत नहीं है.

ज़िन्दगी है ही ऐसी.
इसकी ऐसी की तैसी.


दिल की भी कभी सुन ले,
ऐसी सोच नहीं है.
बड़ी कड़क है साली,
ज़रा भी लोच नहीं है.

हरदम रहती ऐठीं,
इसकी ऐसी की तैसी.



बड़ी ही ना-शुक्री है,
पास नहीं आती,
सुविधाओं के कीचड़ में,
पड़ी रहे अलसाती.

मोटी-काली-भैसीं.
इसकी ऐसी की तैसी.


इसकी मीठी, रसभरी,
बातों पर हँसना नहीं.
करना हाथों पर यकीं,
लकीरों में फंसना नहीं.

झूठी प्रेमिका जैसी.
इसकी ऐसी की तैसी.


: राकेश ०९.०४.२०११.
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2 comments:

मुकेश कुमार तिवारी said...

राकेश जी,

जिन्दगी के लेकर यूँ तो कई फलसफे हैं लेकिन आपकी बातों में एक विरोधाभास हो रहा है कि जिन्दगी एक तरफ तो अलसा रही है सुविधाभोगी होकर वहीं दूसरी ओर आपने कहा है कि "करना हाथों पे यकीं लकीरों में फंसना नही" यह भी अच्छी बात है लेकिन इन दोनों बातों से यह स्पष्ट नही हो पा रहा है कि जब जिन्दगी है ही वैसी जैसी आपने संबोधित की है तो फिर हाथों पे भी यकीन करके करना क्या है?

सादर,

मुकेश कुमार तिवारी

anju choudhary..(anu) said...

सच में बड़ी बेदर्द है ये साली जिन्दगी
ना हँसने देती है ..ना रोने देती है
अपनों को अपना ना बनने देती है
ये साली जिन्दगी ...............(अंजु...(अनु )