Friday, July 17, 2009

गीली धूप के गाँव में / gili dhoop ke gaon me

गीली धूप के गाँव में वह इन्द्रधनुष पर रहती है.
उसकी हंसी से फूल नए रंगों में सजती-संवरती है.

चढ़ती है वह मेरे घर की सीढियाँ भी कुछ इस तरह,
जैसे के आँगन में सवेरे हौले धूप उतरती है.

लहरों से जो खेला करती सूरज संग अटखेलियाँ,
तन्हाई में रातों की वो नदी भी रोया करती है.

उसके होने से जैसे हो जाता हूँ मै शख्स नया,
मेरे होने से कुछ उसकी जुबां भी और निखरती है.

इक हल्की शरारत से उसको जब कोई गीत सुनाता हूँ,
इक हल्की सी मुस्कान नई उसके चेहरे पे बिखरती है.

: rakesh jajvalya

2 comments:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

बहुत सुन्‍दर राकेश जी, यह मुस्‍कान बरकरार रहे.

ansh said...

bahut behtarin...