Wednesday, December 16, 2009

कुछ दिनों पहले मेरी इक बड़ी पुरानी रचना हाथ लगी, शुरूआती दौर की रचना है, स्कुल के टाइम की, यह सोचते हुए पोस्ट कर रहा हूँ कि स्कुल के बाद कालेज के दिनों में भी लिखते रहना चाहिए था :D .

ज़िन्दगी.....
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टुकड़ों-टुकड़ों से मैंने सजा ली है ज़िन्दगी.
कितने जतन से मैंने संभाली है ज़िन्दगी.

छूटा, गिरा और टूट कर बिखर गया,
कांच की ईक नाज़ुक प्याली है ज़िन्दगी.

मौत ने तो कोशिश कम न की मगर,
बेवफा होने से मैंने बचा ली है ज़िन्दगी.

रोते रहिये अपनी ज़िन्दगी को आप,
मैंने आँसुओं में ही पा ली है ज़िन्दगी.

होंगे ग़म लाख मगर, कम नहीं खुशियाँ,
किसी के हँसते गालों की लाली है ज़िन्दगी.

सजाये है मेरी आँखों में ये सितारे किसने,
कि अब तो हर ईक रात दिवाली है ज़िन्दगी.
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: राकेश जाज्वल्य.

1 comment:

संजीव तिवारी .. Sanjeeva Tiwari said...

किसी के हँसते गालों की लाली है ज़िन्दगी.
बहुत सुन्‍दर रचना राकेश जी, धन्‍यवाद.