Monday, June 14, 2010

तुमने जिनको छू लिया.....

हम लकीरों से उलझकर जब कभी बेघर हुए।
चल के तपते पत्थरों पर, चांदनी के दर हुए।

उनकी आँखों से छलक आयीं दो बूंदें गाल पर,
ख़्वाब उनके भी लो अब, नमकिनियों से तर हुए।

यूँ तो साहिल पर पड़े थे, सदियों से पत्थर कई,
तुमने जिनको छू लिया वो टुकड़े संग-मरमर हुए।

बीते बरसों भी कहा था माँ ने की अब लौट आ,
ख़्वाब शहरों के मगर मेरी राह के विषधर हुए।

याद करते ही तुझे ग़ज़लें सी उभरीं आँख में,
कोरे कागज़ थे कभी, अब तितलियों के पर हुए।

आवाजाही बढ गयी लो चाँद की गलियों में फिर,
जो सितारों के ठीये थे, आशिकों के घर हुए।

* राकेश जाज्वल्य.
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4 comments:

संजय भास्कर said...

हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

संजय भास्कर said...

हर शेर लाजवाब और बेमिसाल ..

नीरज गोस्वामी said...

याद करते ही तुझे ग़ज़लें सी उभरीं आँख में,
कोरे कागज़ थे कभी, अब तितलियों के पर हुए।

वाह राकेश जी वाह...कमाल किया है आपने...लिखते रहिये...आपमें एक बहुत अच्छे ग़ज़ल गो बनने की असीम संभावनाएं हैं...
नीरज

shikha varshney said...

आवाजाही बढ गयी लो चाँद की गलियों में फिर,
जो सितारों के ठीये थे, आशिकों के घर हुए।

वाह बेहतरीन ...