Wednesday, July 28, 2010

बदरी फिर घिर आई है.....(गीत)

बदरी फिर घिर आई है।
कैसी उदासी छाई है.............बदरी.......

फिर सावन नैनों से बरसा।
फिर दिल तेरी याद में तरसा।
याद तुम्हारी लाई है.............बदरी........[1]

रुत गीली, पलकें गीली हैं।
बूंदें भी जलती तीली हैं।
रिमझिम आग लगाई है.............बदरी.....[2]

इक-इक दिन आँखों में काटे।
दरवाज़ों से सुख -दुःख बांटें।
तेरे बिन तन्हाई है..............बदरी.....[3]

सोर- संदेसे भी तुम भूले।
नागन से डसते हैं झूले।
सुनी मेरी अमराई है.......बदरी.......[4]

मैं ना अब मैं रही पिया जी।
मेरा ना अब मेरा ही जिया जी।
ये तेरी परछाई है............बदरी.....[5]

अब जब तुम घर को आओगे।
वापस ना यूँ जा पाओगे।
ऐसी कुण्डी मंगाई है.........बदरी....[6]

बदरा फिर घिर आई है।
कैसी उदासी छाई है.............बदरी...

* राकेश जाज्वल्य
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3 comments:

राजेन्द्र मीणा said...

वाह ...! बड़ा ही मनभावन गीत है...पढ़कर आनंद आया ..!!!आभार

Pandit Kishore Ji said...

bada manbhavan geet hain

Sunil Kumar said...

वर्षा ऋतू में यह गीत दिल को छू गया सुंदर अभिव्यक्ति बधाई