Tuesday, November 2, 2010

घुलता है धीमे आँखों में.....................

घर पर बुजुर्गों का होना, सर पर साईं का होना है...
किसी ने क्या खूब कहा है-
मेरे आँगन में इक बूढ़ा-सा शज़र है,
पत्तियां एक नहीं, पर छांह घनी रहती है......
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घुलता है धीमे आँखों में याद का पत्थर।
बीते बरस धुआँ हुआ बुनियाद का पत्थर।

थी राह उँगलियों में जिसके क़दमों में मंज़िल,
उस ओर देखता है हर इक बाद का पत्थर।

होने से जिसके हौसला पाती थी जिंदगी,
जीना है उसके बिन यहाँ फ़रियाद का पत्थर।

छूने से जिसके ग़म सभी खुशियों में ढल गए,
तारों की भीड़ खो गया वो शाद का पत्थर।

वो शख्स था तो थी हजारों राह हर घडी,
जो वो नहीं तो इल्म ना इमदाद का पत्थर।
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: राकेश जाज्वल्य २६।१०।१०

2 comments:

संजय भास्कर said...

बहुत सुन्दर रचना
आपको और आपके परिवार को दीपावली की हार्दिक शुभकामाएं ...

अशोक बजाज said...

'असतो मा सद्गमय, तमसो मा ज्योतिर्गमय, मृत्योर्मा अमृतं गमय ' यानी कि असत्य की ओर नहीं सत्‍य की ओर, अंधकार नहीं प्रकाश की ओर, मृत्यु नहीं अमृतत्व की ओर बढ़ो ।

दीप-पर्व की आपको ढेर सारी बधाइयाँ एवं शुभकामनाएं ! आपका - अशोक बजाज रायपुर