Wednesday, September 22, 2010

..घर से निकलते देर हुई.

जिस दिन बातों में बेर हुई।
घर से निकलते देर हुई।

मेरी ग़ज़लें महज़ शब्द थे,
हँसी तुम्हारी शेर हुई।

कहना-सुनना भर-भर आँखें,
फिर ना कहना देर हुई।

यूँ तेजी से बदला मौसम,
कच्ची अमियाँ चेर हुई।

गिन-गिन उँगली उमर बिताई,
यूँ ही देर सबेर हुई।

थी छटांक सी दिल में मुहब्बत,
तुमसे मिल कर सेर हुई।

* राकेश जाज्वल्य २१।०९।१०।
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बेर = समय।
चेर= वक्त से पहले आम के छोटे फलों का कड़ा हो जाना।
छटांक/ सेर= पुराने दौर के माप/ वज़न।

4 comments:

अनामिका की सदायें ...... said...

bahut acchhi nazm.

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" said...

बहुत बढिया लगी आपकी ये नज्म....
आभार्!

दिगम्बर नासवा said...

थी छटांक सी दिल में मुहब्बत,
तुमसे मिल कर सेर हुई।

खूबसूरत ग़ज़ल है .. लाजवाब शेर ..... मज़ा आ गया पढ़ कर ...

संजय भास्कर said...

खूबसूरत ग़ज़ल है .. लाजवाब शेर ...