Thursday, May 27, 2010

* इक बड़ी गोल-गोल टाइप की कविता*

यह कविता जरा हलके -फुल्के मूड में लिखी है :)
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चन्दा गोल, सूरज गोल,
पृथ्वी घुमे गोल- गोल,
धरती भी गोल है।

शुन्य गोल, चक्के गोल,
घडी के काँटे गोल-गोल,
विज्ञान गोल है।

फूल गोल, हैं तने गोल,
फलियों में दाने गोल-गोल,
प्रकृति गोल है।

सिक्के गोल, रोटी गोल,
पेट भी सबके गोल-गोल,
हर भूख गोल है।

आँखें गोल, रातें गोल,
बातें सबकी गोल- मोल,
दुनिया ही गोल है।

इस वर्तुल दुनिया में,
चाहे चलें कहीं से,
घूम के सबको गोल-गोल,
वहीँ आना है।

पास तुम्हारे, मैं भी फिर-फिर,
लौट आता हूँ जानां...क्यूंकि,
गोल तुम्हारे चेहरे पर ही,
मेरा भी दिमाग गोल है।
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: राकेश जाज्वल्य

2 comments:

परमजीत सिँह बाली said...

बढिया रचना लिखी है...सच मे सभि कुछ गोल है....

पता नही क्या हो रहा है कई ब्लॉगों पर हमारी टिप्पणी भी गोल हो रही है.;)

RAKESH JAJVALYA राकेश जाज्वल्य said...

Bali.....ji...

bahut bahut shukriya.